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जीवन में जरूरी है नकारात्मक सोच: हमेशा ‘ऑल इज़ वैल’ से भी बढ़ती है परेशानी, पढ़ें खबर

Negativity:

Negativity: आपने इतने मोटिवेशनल वीडियोज देखे हैं कि फोन खोलते ही आपकी फीड में मोटिवेशनल रील्स की बाढ़ सी आ जाती है। उन रील्स में कभी चाणक्य तो कभी कन्फ्यूशियस या अरस्तू-प्लेटो-सुकरात के कोट्स के बहाने कुछ करने या न करने की सलाह दी जा रही होती है। यह भी सच है कि इनमें से ज्यादातर ज्ञान के सोर्स अप्रामाणिक और संदिग्ध होते हैं।

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ऐसे वीडियोज में हमेशा पॉजिटिव रहने और सिर्फ अच्छी-अच्छी बातें सोचने की सलाह भी दी जाती है। पॉजिटिव रहना, पॉजिटिव सोचना अच्छी बात है। लेकिन जैसे हर चीज की अति नुकसानदायक होती है, वैसी ही क्या सकारात्मकता की भी अति हो सकती है। क्या जरूरत से ज्यादा हर वक्त पॉजिटिविटी की बातों में डूबे रहने के कुछ खतरे भी हैं।

साइकोलॉजी टुडे की एक नई रिपोर्ट ऐसे ही सवालों पर रौशनी डाल रही है। यह रिपोर्ट कहती है कि जीवन में कई बार निगेटिव सोच भी बड़े काम की होती है। जो लोग हमेशा ख्याली पुलाव पकाते हुए सिर्फ सकारात्मकता में डूबे रहते हैं, सबकुछ को ठीक मान रहे होते हैं, वे करियर और जिंदगी में पीछे छूट जाते हैं।

इस रिपोर्ट की मानें तो कुछ मामलों में निगेटिव एंगल से सोचना, कुछ गलत हो जाने की चिंता करना और उससे निपटने के बारे में सोचना फायदेमंद भी साबित हो सकता है।

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निगेटिव सोच से बढ़ती है क्रिटिकल थिंकिंग

जानी-मानी अमेरिकी लाइफ एंड करियर कोच हेलेन डिलन निगेटिव थिंकिंग को जिंदगी का अहम हिस्सा बताती हैं। खासतौर से समझ विकसित करने और क्रिटिकल थिंकिंग के लिए वह इसे जरूरी मानती हैं।

हेलेन के मुताबिक लगातार सब ठीक हैके भ्रम में रहने से लोग क्रिटिकल थिंकिंग नहीं कर पाते। उनका दिल और दिमाग कंफर्ट जोन में चला जाता है। उन्हें अपने सपने, लक्ष्य और चुनौतियों को भी ठीक तरीके से समझ पाने में कठिनाई आ सकती है।

दूसरी ओर, अगर कोई जरूरत के मुताबिक निगेटिव सोच को आने दे और उस पर गंभीरता से विचार करे यानी क्रिटिकल थिंकिंग करे, अपने दिल और दिमाग पर जोर डालकर बार-बार सोचे, अच्छे-बुरे परिणामों की चिंता करे तो उसकी प्लानिंग और तैयारी खुद-ब-खुद बेहतर हो जाती है। जिसका सीधा असर जिंदगी और करियर पर दिखता है।

हमेशा ऑल इज वेलकी सोच से ज्यादा तनाव

मान लीजिए कि A और B दो दोस्त हैं। A मुश्किलों में भी खुश रहने और पॉजिटिव दिखने की कोशिश करता है। निगेटिव ख्यालों से दूर भागता है। मुश्किल परिस्थिति में भी ऑल इज वेलका मंत्र दोहराता रहता है।

दूसरी ओर, B आमतौर पर पॉजिटिव रहता है, लेकिन कई बार निगेटिव ख्याल भी उस पर हावी हो जाते हैं। उस डर लगता है कि ऑफिस में प्रेजेंटेशन ठीक से नहीं बना तो। फलां प्रोजेक्ट हाथ से निकल गया तो। अगर कोई दोस्त या सहकर्मी मुझसे नाराज हो गया तो।

यहां समझने वाली बात ये भी है कि यह निगेटिव थिंकिंग लगातार नहीं बनी रहती, बल्कि समय-समय पर सिर उठाती है।

जानते हैं इस थिंकिंग प्रॉसेस का A और B की लाइफ पर क्या असर होगा?

इस तरह सोचने का नतीजा ये होता है कि संभावित खतरों के डर से वह उस काम को बेहतर करने की कोशिश करता है। प्रोजेक्ट में ज्यादा मेहनत करता है, दोस्तियों और रिश्तों में खुद को ज्यादा इंवेस्ट करता है। प्रेजेंटेशन को ज्यादा मेहनत से बनाता है।

नतीजा ये होता है कि पीरियॉडिकल और ऑकेजनल निगेटिविटी उसे ज्यादा बेहतर काम करने के लिए प्रेरित करती है। हर वक्त सिर्फ पॉजिटिविटी में ही डूबे रहने वाला व्यक्ति कई बार यह करने में चूक जाता है।

अमेरिका की वॉशिंगटन यूनिवर्सिटी में साइकोलॉजी और ब्रेन साइंस की असिस्टेंट प्रोफेसर एमिली विलरोथ ने अपनी रिसर्च में पाया कि बुरे ख्यालों को झुठलाने और मन ही मन सबकुछ ठीक होने का भ्रम पालने वाले लोगों को ज्यादा तनाव होता है। इस स्थिति में डिप्रेशन की आशंका भी अधिक होती है।

दूसरी ओर, नकारात्मकता को स्वीकार कर उससे निकलने के बारे में क्रिटिकल थिंकिंग करने वाले लोग थोड़े समय में खुद-ब-खुद पॉजिटिव हो जाते हैं।

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